सबसे पहले तो धर्म के नाम पर लड़ने वालो कि जय हो (अगर वो ऐसा ना करे तो उन्हें कौन पूछे यहाँ ).
आप सभी ऐसे मुद्दों को क्यों उठाते हो ?
ऐसे मुद्दों पर बात करने के लिये और उन पर रोटिया सेकने के लिये तो देश के राजनीतिक दल ही काफी थे भाइयो .
इन सब बातों से किसी को क्या हांसिल हुआ हैं? कोई तो मुझे बता दो कृपा करके.
धर्म के नाम पे जितने भी मसले उठे हैं उनसे काफी जनहानि हो चुकी हैं पहले ही, पर कभी किसी धार्मिक अवसाद से उत्पन माहोल से पीड़ित लोगो से बात करके देखो कि वो क्या कहते हैं.
वो किसी धर्म को नही सिर्फ अपनों के दर्द को समझते हैं और मेरे ख्याल से मानव धर्म सबसे बड़ा हैं. जो दुसरो का कष्ट महसूस करे वो सबसे बड़ा धरमपुरुष हैं.
इसलिए अगर बढ़ाना हैं तो सोहार्द बढाइये. बस इतना ही निवेदन हैं.
वो सब पहले वाली बातें थी आज के दौर में अगर जीना हैं तो ऐसी सोच बदलनी पड़ेगी.
संजीव राणा
हिन्दुस्तानी
शनिवार, 27 मार्च 2010
गुरुवार, 25 मार्च 2010
बुजुर्गो का सम्मान करे क्योंकि एक दिन आप को भी बुजुर्ग होना हैं.
श्याम सुंदर जी को इस बात का अफ़सोस हैं कि उनका लड़का मोहन उनकी बात नही सुनता हैं.
रामचंद्र जी को खाली घर काटने को दौड़ता हैं.
शिवराम जी को इस बात का ख्याल सताता हैं कि भरा पूरा परिवार होने के बावजूद भी उनका दिल इतना तन्हा क्यों हैं.
ये सब बातें सुनने में तो बहुत आसान लग रही हैं. लेकिन कभी इन सब के बारे में जरा गहराई से सोचकर तो देखो .
जरा इस बात का अहसास करके तो देखो कि हम जिसे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं और वो हमसे बोलना भी पसंद ना करे तो हम पर क्या बीतेगी .
वैसे भी कहते हैं कि शादी के बाद घरवालो के बजाये अपनी श्रीमती जी ज्यादा अच्छी लगती हैं और जब बच्चे हो जाये तो उनपर तो श्रीमती जी से भी ज्यादा प्यार आने लगता हैं. कई बार तो जितने भी झगडे हो तो सहमती बच्चो के कारण ही बन पाती हैं. ये तो रहा यहाँ तक का सफ़र , अब जरा सोचिये जब उन बच्चो कि शादी हो जाती हैं तो प्रकर्ती का नियम , दोबारा वही बात वहीँ से शुरू हो जाती हैं. लेकिन अब अगर वो बच्चे जिन्हें हम अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं और जिनकी एक छोटी सी दर्द भरी आवाज से हम पूरी रात नही सो पाते थे अगर अब वो हमसे बोलना भी पसंद ना करे तो हम पे क्या गुजरेगी.
हाँ ये बात जरुर होती हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी सोच में बदलाव आता जाता हैं . और आज हम अपने आप को अपने माता- पिता से ज्यादा समझदार मानते हैं , कल हमारे बच्चो के साथ भी तो यही होना हैं. ये भी सोचकर चलिए.
किसी ने सही कहा हैं कि
"जवानी जाकर आती नही हैं और
बुढ़ापा आकर जाता नही हैं "
वो कंधे जो हमें हमेशा ऊपर उठाने के लिये तैयार रहते थे क्या आज हम सिर्फ उनसे प्यार से बात भी नही कर सकते ?
ये हमेशा याद रखना कि उन्होंने हमें जन्म दिया हैं तो कम से कम हम उनसे ऊरीण तो ना हो .
उन्होंने आपको बचपन में संभाला तो आपकी भी जिम्मेदारी बनती हैं कि उन्हें बुढ़ापे में संभाले क्योंकि बुढ़ापा भी बचपन का दूसरा रूप हैं.
मुझे एक बात याद आ रही हैं जरा गौर करियेगा
" कल जब हम छोटे थे और कोई हमारी बात भी नही समझ पाता था तब सिर्फ एक हस्ती थी जो हमारे टूटे - फूटे अल्फाज भी समझ लेती थी , और आज हम उसी हस्ती को ये कहते हैं कि
(आप नही जानती )
(आप नही समझ पाएँगी)
(आपकी बात मुझे समझ नही आती )
(हो गयी अब आप खुश )
आप समझ ही गये होंगे कि में किस कि बात कर रहा हूँ.
तो इस सम्माननीय हस्ती का सम्मान करे इससे पहले कि देर हो जाये.
"शख्त रास्तो में भी आसान सफ़र लगता हैं
ये उसे माँ कि दुवाओ का असर लगता हैं
एक मुद्दत से उसकी माँ नही सोई जब
उसने कहा था कि 'माँ मुझे डर लगता हैं"
बस सोच लेना जैसा अपने माता - पिता के साथ करोगे तो आप के बच्चे भी तो आप से ही सीखते हैं , वो भी वैसे ही करेंगे .
तो क्यों ना उनको अच्छी सीख दे अपनी अच्छी बातों से .
और उन्हें बुजुर्गो कि सेवा और प्यार करना सिखाये .
आगे चलकर ये आपके मान सम्मान कि बात होगी.
कुच्छ समय घर में बुजुर्गो के साथ अवश्य बिताये .और फिर देखना उनके प्यार और दुवाओ कि आप पर कैसे अच्छी बरसात होती हैं.
सोमवार, 22 मार्च 2010
आज का दौर और बढ़ता तनाव
अनिल पुसाद्कर जी के लेख आतम हत्या को पढ़कर सचमुच मन सोचने को मजबूर हो गया है कि आखिर क्या क्या कारण हो सकते हैं कि एक आदमी आतम हत्या के रास्ते को चुनता हैं.
क्यों उसको ऐसा लगने लगता हैं की उसके लिये इस दुनिया में जीना मरने से भी मुश्किल हो गया हैं.
ये जानकर हर बार दुःख होता हैं कि फिर आज फलां बच्चे ने suside कर लिया हैं.
इसके कारण तो बहुत हैं और मै ये समझता हूँ की जब तक ये अफरा - तफरी का दौर चलता रहेगा तब तक ये बातें भी होती ही रहेगी.
हम भारतीय बहुत ही भावुक होते हैं और अपनी भावनाओं को अपने बच्चो पर थोपते हैं.
होता यू हैं कि हम खुद जब अपनी जिन्दगी में कुछ काम नही कर पातें तो अपने बच्चो को आशा के रूप में देखने लगते हैं.
बिना इसकी परवाह किये कि क्या वह इसके लिए तैयार हैं .और हम अपनी मानसिकता ऐसी बना लेते हैं की हमें किसी भी कीमत पर वो चीज़े चाहिए .
इसके लिए उनपर हमेशा दबाव बनाते रहते हैं.
आपने अपने आसपास काफी माता- पिता को यह कहते सुना होगा कि पडोसी के बच्चे की तो फर्स्ट division आई हैं तो तेरी क्यों नही आई. उसने ये मैडल लिया हैं तूने क्यों नही लिया .
तू उसके जितना क्यों नही पढता हैं.
वो कितना अच्छा हैं और तू कहा भी नही मानता हैं.
ये सब बातें कहने वाला तो आराम से कह जाता हैं यह जाने बिना की जो सुन रहा है उसके जीवन में ये बातें कितना अंतर पैदा कर देगी.
आज आप किसी भी विद्यालय के पास जाकर देखो कि बच्चो के कंधो पे इतना बोझ होता हैं जितना सायद उनमे खुद में भी नही होता होगा.
पहले भी तो अच्छे विद्यार्थी होते थे ऐसी तो बात नही की अब अलग पढाई पढ़ी जा रही हैं .
फिल्म अभिनेता आमिर खान ने तो अपनी पिछली दोनों फिल्मो में यही बताने का प्रयास किया हैं कि हर बच्चा अपने आप में ख़ास हैं और उसकी किसी दूसरे से तुलना भी नही की जानी चाहिए. " तारे जमीन पे" और three idiots इसका एक अच्छा उदाहरण हैं
मेरे ख्याल से इन सबका सबसे अच्छा हल तो ये हैं कि हम अपने बच्चो को हालात से जूझना सिखाये . उनमे हार या असफलता का डर ख़त्म करे .
उनको उनकी हर कौशिश पे ये समझाया जाये की बेटा तुम कौशिश करो और कभी हार या असफलता से मत घबराओ .
कभी रिजल्ट खराब आये तो उनको विश्वास में लेकर ये सिखाओ की कोई बात नही हैं जो तू असफल हो गया हैं.
जिन्दगी में सिर्फ यही अकेला अवसर नही था जो तूने खो दिया है. तू हिम्मत कर और इस हार के कारणों को दूर करते हुए तब तक कौशिश कर जब तक ये हार जीत में ना बदल जाए .
उसके मन से असफल होने का डर निकालकर अपने प्यार को उसकी ताकत बनाकर तो देखो . फिर देखो कि वो जीवन के हर संघर्ष और तनाव को कैसे संजीदगी , उत्साह और आतम विश्वास के साथ लेता हैं.
क्योंकि
" दोस्तों समय को तो बीत ही जाना हैं चाहे हम उस दौरान हँसे या रोये. जब बीतना ही हैं तो क्यों ना हँस के बिताये .
क्योंकि ये ना हो कि हम अपने अहम् और दुनिया के competition में यह भी भूल जाये कि ये जीवन अनमोल हैं और हमें इसको ऐसे ही नही गवाना हैं.
ये मेरी एक छोटी सी कौशिश थी जो मेरे जहन में आ रही थी और मैंने काफी ऐसे लोगो को देखा हैं जो इस तरह की सोच रखकर आज खुश हैं
अनिल जी का धन्यवादी hun जो इस अहम् मुद्दे पे सुरुआत की.
और आप सभी से भी यही चाहूँगा कि अपनी राय या और अच्छे सुझाव इन सब तनाव को कम करने के लिए टिपण्णी के रूप में नज़र जरुर करोगे.
जीना इसी का नाम हैं
जब तक जियो हँस के जियो
संजीव राणा
हिंदुस्तान
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