गुरुवार, 25 मार्च 2010

बुजुर्गो का सम्मान करे क्योंकि एक दिन आप को भी बुजुर्ग होना हैं.


श्याम सुंदर जी को इस बात का अफ़सोस हैं कि उनका लड़का मोहन उनकी बात नही सुनता हैं.
  रामचंद्र  जी को खाली घर काटने को दौड़ता हैं. 
शिवराम  जी को इस बात का ख्याल सताता हैं कि भरा पूरा परिवार होने के बावजूद भी उनका दिल इतना तन्हा क्यों हैं.

ये सब बातें सुनने में तो बहुत आसान लग रही हैं. लेकिन कभी इन सब के बारे में जरा गहराई से सोचकर तो देखो .
जरा इस बात का अहसास करके तो देखो कि हम जिसे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं और वो हमसे बोलना भी पसंद ना करे तो हम पर क्या बीतेगी .
वैसे भी कहते हैं कि शादी के बाद घरवालो के बजाये अपनी श्रीमती जी ज्यादा अच्छी लगती हैं और जब बच्चे हो जाये तो उनपर तो श्रीमती जी से भी ज्यादा प्यार आने लगता हैं. कई बार तो जितने भी झगडे हो तो सहमती बच्चो के कारण ही बन पाती हैं. ये तो रहा यहाँ तक का सफ़र , अब जरा सोचिये जब उन बच्चो कि शादी हो जाती हैं तो प्रकर्ती का नियम , दोबारा वही बात वहीँ  से शुरू हो जाती हैं. लेकिन अब अगर वो बच्चे जिन्हें हम अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं और जिनकी एक छोटी सी  दर्द भरी आवाज से हम पूरी रात नही सो पाते थे अगर अब वो हमसे बोलना भी पसंद ना करे तो हम पे क्या गुजरेगी. 

हाँ ये बात जरुर  होती हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी सोच में बदलाव आता जाता हैं . और आज हम अपने आप को अपने माता- पिता से ज्यादा समझदार मानते हैं , कल हमारे बच्चो के साथ भी तो यही होना हैं. ये भी सोचकर चलिए.
किसी ने सही कहा हैं कि 
"जवानी जाकर आती नही हैं और 
बुढ़ापा आकर जाता नही हैं "

वो कंधे जो हमें हमेशा ऊपर उठाने के लिये तैयार रहते थे क्या आज हम सिर्फ उनसे प्यार से बात भी नही कर सकते ?

ये हमेशा याद रखना कि उन्होंने हमें जन्म दिया हैं तो कम से कम हम उनसे ऊरीण तो ना हो .
उन्होंने आपको बचपन में संभाला तो आपकी भी जिम्मेदारी बनती हैं कि उन्हें बुढ़ापे में संभाले क्योंकि बुढ़ापा भी बचपन का दूसरा रूप हैं.

मुझे एक बात  याद आ रही हैं जरा गौर करियेगा 

" कल जब हम छोटे थे और कोई हमारी बात भी नही समझ पाता था तब सिर्फ एक हस्ती थी जो हमारे टूटे - फूटे अल्फाज भी समझ लेती थी , और आज हम उसी हस्ती को ये कहते हैं कि 
(आप नही जानती )
(आप नही समझ पाएँगी) 
(आपकी बात मुझे समझ नही आती )
(हो गयी अब आप खुश )

आप समझ ही गये होंगे कि में  किस कि बात कर रहा हूँ.
तो इस सम्माननीय हस्ती का सम्मान करे इससे पहले कि देर हो जाये.
 
"शख्त रास्तो में भी आसान सफ़र लगता हैं

ये उसे  माँ कि दुवाओ का असर लगता हैं

एक मुद्दत से उसकी माँ नही सोई जब

उसने कहा था कि 'माँ मुझे डर लगता हैं"

बस सोच लेना जैसा अपने माता - पिता के साथ करोगे तो आप के बच्चे भी तो आप से ही सीखते हैं , वो भी वैसे ही करेंगे .
तो क्यों ना उनको अच्छी सीख दे अपनी अच्छी बातों से .
और उन्हें बुजुर्गो कि सेवा और प्यार करना सिखाये .
आगे चलकर ये आपके मान सम्मान कि बात होगी.
कुच्छ समय घर में बुजुर्गो के साथ अवश्य बिताये .और फिर देखना उनके प्यार और दुवाओ कि आप पर कैसे अच्छी बरसात होती हैं.

7 टिप्‍पणियां:

  1. साहब मैं इस विषय में सिर्फ इतना कहना चाहूँगा की जो हम बोते हैं वही हम काटते हैं। जो कुछ भी हमने कल बोया था उसका फल हमें आज मिलेगा। और जो भी हम आज बोयेंगे उसका फल हमें कल जरुर मिलेगा। इसलिए जो आज दुखी हैं वो अपने बीते कल को जरा ढंग से यादकर लें । और जो आज किसी को दुखी कर रहे हैं वो अपने कल का इंतजाम अच्छे से कर लें।

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  2. कृपया पोस्ट हेडिंग में सुधार करें

    अगर हम बुजुर्गों का सम्मान इस लिए करे क्योकि हमें खुद भी एक दिन बुजुर्ग होना है तो अंधेर है भाई
    इससे बड़ा स्वार्थ क्या होगा
    अगर किसी को पता हो की वो ३० साल में मर जायेगा तो वो क्या करे ?

    कमेन्ट को अन्यथा ना लें

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  3. वीनस केशरी जी की बात से इत्तेफाक रखते हुय यही कहना है कि बुज़ुर्गों का सम्मान करने ज़रुरी है इसलिये नहीं कि हमें बूढा होना है, बल्कि इसलिये कि हम उस देश के वासी हैं जहाँ कहते हैं – “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि.”

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  4. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  5. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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  6. इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  7. veenas keshri ji aapse bilkul sahmat hu lekin bhai ji aap hi sochiye ki agar swarth beech me naa aaye to mujhe ye likhne ki jarurat hi na padti.
    mera matlab sirf is baat se h ki aaj swarth ke kaaran hi ye sab ho raha h ki log apne bujurgo ko varidhaasharam me chhod dete h .
    agar swarth beech me na aaye to kisi ko kuch bhi samjhaane ki jarurat nhi h.
    ab swarth ka parda hatane ke liye hi meine ye likha ki ek din unhe bhi boodhe hona h jo swarthvash apne bujurgo ka dhayaan nhi rakhte.
    rahi baat acche aur pyaar karne wale logo ki to unhe to ye batane ki jarurat hi nhi h.
    thanks for ur comment.

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